*धर्म का मर्म*
धर्म तो सचमुच महान होता है, एक धर्म दूसरे का खंडन नहीँ करता है,क्योंकि धर्म ईश्वरावतारों द्वारा समय समय पर स्थापित किये जाते हैं, ईश्वरावतार श्रीकृष्ण का श्रीमदगीता में वर्णित वचन
"*यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्*
यही शिक्षा देता है, धर्म धारण करने की आध्यात्मिक वस्तु है,
जो धर्म को धारण करता है व एक दूसरे धर्म व धर्मानुयायी में अंतर नहीं समझता, जो धर्म को नहीं अपनाता है उसे मनुष्य- मनुष्य में भेद दिखता है और वही भेद करता है इसके लिए धर्म उत्तरदाई नहीं है, महाउपनिषद का उद्दरण "*अयं निज परावेति, गणना लघु चेतसाम,उदार चारितानां, तु वसधैव कुटुंबकम"* मानवीय एकता की शिक्षा देता है~*घनश्याम सिंह*
*सर्व धर्म स्वाध्यायी,त्रिभाषी साहित्यकार व वरिष्ठ पत्रकार*
*(औरैया उप्र)*
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