ऐसे बीजेपी को मात दे सकते हैं चाचा-भतीजे
जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख चुनाव में सत्ताधारी बीजेपी और सपा के बीच कांटे का मुकाबला होने की संभावना दिख रही है. सूबे में कई जिलों में निर्दलीय ही निर्णायक स्थिति में हैं, जिनमें शिवपाल यादव के काफी समर्थक भी जीतकर आए है. खासकर इटावा, मैनपुरी, औरया, कन्नौज, फिरोजाबाद जैसे जिले में, जिन्हें मुलायम परिवार के प्रभाव वाला इलाका माना जाता है. यहां लंबे अरसे से सपा का सियासी प्रभुत्व रहा है. मुलायम बेल्ट में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में अगर शिवपाल और अखिलेश साथ आते हैं तो बीजेपी की चुनौतियों से निपट ही नहीं सकते बल्कि उसे मात भी दे सकते हैं.इटावा जिला पंचायत में सपा का 32 सालों से कब्जा है और अगला अध्यक्ष भी सपा से होगा यह चुनाव के नतीजों ने तय कर दिया है. 2017 के विधानसभा चुनाव में इटावा जिले में दो सीटों और 2014-2019 में इटावा संसदीय क्षेत्र फतह करने वाली बीजेपी केवल एक जिला पंचायत सदस्य ही जिता पाई है. इटावा में कुल 24 जिला पंचायत सदस्य हैं, जिनमें से 9 सपा, 8 प्रसपा, 1 बसपा, 1 बीजेपी से और 5 निर्दलीय जीते हैं.
बीजेपी ने की थी मुलायम बेल्ट पर कब्जे की पूरी कोशिश
बीजेपी ने मुलायम के गढ़ इटावा जिले की सभी 24 जिला पंचायत सदस्य की सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे, सांसद से लेकर विधायक तक ने यहां प्रचार किया था और पूरा जोर लगाया था, लेकिन शिवपाल-अखिलेश के अंदरूनी गठजोड़ के चलते बीजेपी यहां महज एक सीट ही जीत सकी. वहीं, अब जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में सपा का साथ प्रसपा दे सकती है, क्योंकि जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में दोनों के साथ आने का प्रयोग कामयाब रहा है. यही प्रयोग अब अध्यक्ष के चुनाव में दोहराने की तैयारी में दोनों दल लगे हैं.इटावा जिला पंचायत पर तीन दशक से ज्यादा से सपा का कब्जा है. 1989 में सपा के प्रो रामगोपाल यादव जिला पंचायत अध्यक्ष बने थे. इसके बाद शिवपाल यादव अध्यक्ष बने. 2006 में सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई राजपाल सिंह यादव की पत्नी प्रेमलता यादव जीतीं. उन्होंने दो कार्यकाल पूरे किए और 2016 में उनके बेटे अभिषेक यादव उर्फ अंशुल जिला पंचायत अध्यक्ष बने. इस बार भी जिला पंचायत की कुर्सी पर अभिषेक यादव के काबिज होने की संभावना दिख रही हैं, क्योंकि शिवपाल सिंह यादव ने भी चुनावों के बाद परिवार में एका के संकेत दिए थे.फिरोजबाद के जिला पंचायत की कुल 33 सीटों में से सपा 16 और शिवपाल यादव की पार्टी के दो सदस्य जीते हैं. इसके अलावा बसपा के तीन, बीजेपी के 5 और 7 निर्दलीय विजयी उम्मीदवार हैं. ऐसे में अखिलेश और शिवपाल मिलकर आसानी से जिले पर अपना कब्जा बरकरार रख सकते हैं. मैनपुरी जिला पंचायत सदस्य की 30 सीटें हैं, जिनमें से 12 सपा, 9 निर्दलीय, 8 बीजेपी और एक पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की है. कन्नौज जिले की कुल 28 सीटें हैं, जिनमें से 11 सपा, 6 बीजेपी, 1 बसपा और 10 पर निर्दलीय जीते हैं. मैनपुरी-कन्नौज जिले में निर्दलीय में शिवपाल के कई समर्थक भी हैं. ऐसे में शिवपाल और अखिलेश हाथ मिलकर अध्यक्ष के चुनाव में बीजेपी के लिए चुनौती खड़ी कर सकते हैं.
पश्चिम यूपी से सेंट्रल यूपी तक सपा की रणनीति एक जैसी
वहीं, सपा पश्चिमी यूपी में आरएलडी के साथ भी तालमेल कर बेहतर परिणाम ले आई. बागपत से लेकर गाजियाबाद, बिजनौर, मेरठ, शामली, हापुड़, बुलंदशहर, अलीगढ़ में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में सपा-आरएलडी गठजोड़ बीजेपी के लिए चुनौती बन सकता है. अखिलेश यादव का छोटे दलों के साथ हाथ मिलाने का फॉर्मूला हिट होता नजर आ रहा है और माना जा रहा है कि सपा जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में इसी रणनीति पर पश्चिम यूपी से लेकर सेंट्रल यूपी में अपना सियासी वर्चस्व कायम रखेंगी.सपा पंचायत चुनाव के नतीजों से उत्साहित है और इसलिए अगले साल होने वाली चुनावी जंग में आपसी विवाद के चलते नुकसान का जोखिम नहीं लेगी, क्योंकि 2017 के विधानसभा चुनाव पारिवारिक कलह से पार्टी को खासा नुकसान उठाना पड़ा था और सत्ता भी गंवांन पड़ी है. इसके बाद लोकसभा चुनाव में सपा को पांच सीट मिल पाई तो शिवपाल की पार्टी भी कुछ खास नहीं कर पाई. हालांकि, शिवपाल यादव के जरूर फिरोजाबाद लोकसभा सीट से उतरने के चलते रामगोपाल यादव के बेटे को मात खानी पड़ी थी. ऐसे में सपा 2022 के लिए कोई जोखिम भरा कदम नहीं उठाना चाहेगी.
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