उत्तर प्रदेश न्यूज21संवाददाता
★हर 830 जन्में बच्चों में एक डाउन सिंड्रोम से ग्रसित
भारत में हर वर्ष 23 से 29 हज़ार बच्चे डाउन सिंड्रोम के साथ लेते है जन्म
★विश्व में सबसे ज़्यादा डाउन सिंड्रोम से ग्रसित बच्चे भारत में
★आरबीएसके के अंतर्गत मिल सकती है सलाह और उपचार
★ट्रिपल टेस्टिंग के जरिये पता चल सकता है डाउन सिंड्रोम
कानपुर:डाउन सिंड्रोम जिसे ट्राईसोमी 21 भी कहा जाता है, एक ऐसी स्थिति है जिसमें अतिरिक्त आनुवंशिक सामग्री एक बच्चे के मानसिक और शारीरिक रूप से विकसित होने के तरीके में देरी का कारण बनती है। डाउन सिंड्रोम फ़ैडरेशन ऑफ इंडिया के अनुसार विश्व में इस सिंड्रोम के सबसे ज़्यादा बच्चे भारत में जन्म लेते हैं। अमूमन जन्में हर 830 बच्चों में से एक डाउन सिंड्रोम से ग्रसित होता है, वही हर वर्ष लगभग 23 से 29 हज़ार बच्चे इस सिंड्रोम के साथ जन्म लेते हैं।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के शिशु विभाग के प्रोफेसर डॉ॰ अरुण कुमार आर्य बताते है कि डाउन सिंड्रोम आनुवंशिक जन्मजात विकारों में से एक प्रमुख विकार है। यह बीमारी नवजात को मां के गर्भ में ही होती है। डाउन सिंड्रोम शरीर में क्रोमोसोम की असामान्य संख्या की वजह से होता है। सामान्य तौर पर व्यक्ति के शरीर में 46 क्रोमोसोम होते हैं। इनमें से 23 क्रोमोसोम (गुणसूत्र) मां के और 23 पिता के जीन से मिलते हैँ। डाउन सिंड्रोम से पीड़ित नवजात में 47 क्रोमोसोम आ जाते हैं। क्रोमोसोम का एक अतिरिक्त जोड़ा शरीर और मस्तिष्क के विकास को प्रभावित करता है। ज्यादातर मामलों में संतान को अतिरिक्त क्रोमोसोम मां के जीन से मिलता है। अतिरिक्त क्रोमोसोम को ट्राइसोमी 21 कहते हैं। ट्रिपल टेस्टिंग के जरिये पता चल सकता है डाउन सिंड्रोम
डॉ॰ आर्य बताते है कि गर्भावस्था के दौरान ट्रिपल टेस्टिंग और अल्ट्रा सोनोग्राफी के जरिये डाउन सिंड्रोम का पता लगाया जा सकता है। जांच के अनुसार यदि बच्चा डाउन सिंड्रोम से ग्रसित है तो उसका गर्भपात ही कराया जाता है।
इलाज़
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के डीईआईसी मैनेजर अजीत बताते है कि आरबीएसके के अंतर्गत आने वाले 4 डी में से एक डी डिफ़ेक्ट एट बर्थ यानि जन्मजात विकृति में डाउन सिंड्रोम की कंडीशन भी है। ऐसे तो इस विकृति का कोई इलाज़ नहीं है, लेकिन समस्या के अनुसार थेरेपी और मेडिकल ट्रीटमेंट दिया जाता है। डाउन सिंड्रोम फ़ैडरेशन ऑफ इंडिया के अनुसार वर्ष 1960 में इस बीमारी से ग्रसित बच्चे 10 वर्ष की आयु भी तय नहीं कर पाते थे, लेकिन अभी थेरेपी, अलग स्पेशल स्कूल और मेडिकल सहायता की मदद से औसतन आयु 50-60 वर्ष तक की हो गयी है।
डाउन सिंड्रोम की पहचान
- चपटा चेहरा, खासकर नाक चपटी
- ऊपर की ओर झुकी हुई आंखें
- छोटी गर्दन और छोटे कान
- मुंह से बाहर निकलती रहने वाली जीभ
- मांसपेशियों में कमजोरी, ढीले जोड़ और अत्यधिक लचीलापन
- चौड़े, छोटे हाथ, हथेली में एक लकीर
- अपेक्षाकृत छोटी अंगुलियां, छोटे हाथ और पांव
- छोटा कद
- आंख की पुतली में छोटे सफेद धब्बे
डाउन सिंड्रोम से पीड़ित मरीजों में लक्षण
- सुनने की क्षमता कम होना
- कानों का संक्रमण
- नजर कमजोर होना
- आंखों में मोतियाबिंद होना
- जन्म के समय दिल में विकृति
- थॉयरॉयड
- आंतों में संक्रमण
- एनीमिया
- मोटापा
प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है डाउन सिंड्रोम दिवस
भारत में इस अवस्था को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए यह दिवस मनाया जाता है। सबसे पहले इसके सामान्य लक्षणों का वर्गीकरण ब्रिटिश डॉक्टर जॉन लैग्डन डाउनस ने किया था, इसीलिए इनके नाम पर इस विकार का नाम रखा गया।
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