जातीय समीकरणों पर चुनाव जीतने की राजनीतिक दलों की चल रही कवायद

*जातीय समीकरणों पर चुनाव जीतने की राजनीतिक दलों की चल रही कवायद* 

*बिधूना,औरैया।* बिधूना विधानसभा क्षेत्र 202 में प्रत्येक चुनाव में अधिकांशतः जातीय समीकरण ही प्रत्याशियों की जीत हार के आधार साबित होते नजर आए हैं और इस बार भी मुद्दों की अपेक्षा जातीय समीकरण पर ही प्रभावी होते नजर आ रहे हैं इतना जरूर है, कि चुनाव के पूर्व हुए दल बदल व इससे पैदा हुई नाराजगी के चलते चलते दिग्गजों द्वारा विरोधियों को नुकसान पहुंचाए जाने के साथ पार्टी के अंदर बैठे विभीषणों से भी भितरघात की अधिक संभावना जताई जा रही है। इस विधानसभा क्षेत्र में लगभग 354500 मतदाता हैं। जिसमें 45000 यादव , 42000 क्षत्रिय , 33000 लोधी , 20000 पाल , 26000 शाक्य , 20,000 मुस्लिम , 43000 जाटव , 16000 वैश्य , 13000 कहार , 10,000 कुम्हार , 7000 तेली , 28000 ब्राह्मण , 50,000 अन्य मतदाता है। इस सीट पर पहले सवर्णों का वर्चस्व रहा और बाद में इस सीट पर पिछड़ा वर्ग के समाजवादियों आप कब्जा हो गया वह चुनावों में चली राम लहर में भाजपा भी इस सीट पर काबिज रही, लेकिन इस बार के चुनाव में इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी से क्षत्रिय समाज के प्रत्याशी को उतारा गया। ऐसे में पिछले कई चुनावों से चुनाव की जीत हार की निर्णायक भूमिका निभाता रहा क्षत्रिय मतदाता बसपा के तरफ झुका तो खासकर भाजपा को नुकसान पहुंचने व सपा बसपा को फायदा पहुंचाने की बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। बसपा के अलावा इस क्षेत्र के अधिकांश प्रमुख राजनैतिक दलों में अपने ही तनाव के विभीषणों असंतुष्टों से अधिक खतरा माना जा रहा है। हालांकि उपरोक्त सभी राजनीतिक दल अपनी पार्टियों में भितरघात होने की बात से साफ इंकार कर रहे हैं और यदि यह राजनीतिक दल अपने असंतुष्टों को मनाने में कामयाब रहे तो चुनावी समीकरण बुलेट बुलेट होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। वैसे इस क्षेत्र में मुद्दों की अपेक्षा जातीय समीकरण ही हार जीत का आधार बनते आए हैं और जातीय समीकरण के बलबूते ही प्रत्याशी अपनी-अपनी फिंजा बनाने में लगे नजर आ रहे हैं।

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