*परम आदरणीय पत्रकार नरेश भदौरिया जी के विषय में पढ़कर ह्रदय हुआ विदीर्ण*
*याद आया वह गाना*- *कोई किसी का नहीं है जग में रिश्ते हैं रिश्तों का क्या*.....?*
*वरिष्ठ पत्रकार स्वामी शरण श्रीवास्तव जिलाध्यक्ष ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन उत्तर प्रदेश जनपद इटावा की मार्मिक अपील*
*औरैया।* हमारे साथ बैठे हुए हमारे बड़े भाई पत्रकारिता की क, ख, ग, बताने वाले कलम की नोक से खाने वाले दैनिक जागरण के मेरठ संस्करण में उप संपादक रहे, तथा बहुत ही जीवट के व्यक्ति रहे, आदरणीय बड़े भाई नरेश भदौरिया जी से भरथना इटावा स्थित एक वृद्धाश्रम में मुलाकात हुई। उन्हें उस अवस्था में देखकर मन बहुत उदास हुआ, बहुत हैरान व परेशान भी हुआ। क्योंकि जनपद इटावा सहित पास पड़ोस के सभी जनपदों में लोकप्रिय पत्रकार के रूप में चर्चित पत्रकार की बुढ़ापे में ऐसी स्थिति होगी इसकी कभी कल्पना भी नहीं की गई होगी। इटावा जनपद जैसी राजनैतिक व शैक्षिक उर्वरा भूमि भी एक पत्रकार को भी वह सभी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाएगी, ऐसी कभी उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। पत्रकारिता के लिए जीने व मरने वाला व्यक्ति जीवन के अंतिम दिन किसी वृद्धाश्रम में गुजारेगा इसकी कल्पना मात्र से प्रत्येक जागरूक व्यक्ति का मन अवश्य ही दुःखी हो जाएगा। आठवें दशक में मुझ जैसे व्यक्ति को कुम्हार की तरह पीट पीटकर एक अच्छे पत्रकार के रूप में समाज की सेवा के लिए तैयार करने का काम आदरणीय भदौरिया जी ने किया था। जिसके लिए मैं आज भी उनका कर्जदार हूँ , और इसी कर्तव्य बोध के कारण जब यह पता चला कि आदरणीय भदौरिया जी वृद्धाश्रम में जीवन गुजार रहे हैं। उनसे मिलने के लिए मन व्याकुल हो गया, और बीते दिवस मैंने उस वृद्धाश्रम में जाकर उनकी चरण रज लेकर पुनः उनका आशीर्वाद लिया। श्री भदौरिया जी द्वारा अपनी जो आपबीती बताई गई वह निश्चित रूप से हृदय विदारक थी। उनसे मिलने के बाद इस बात का भी बोध हुआ कि यह समाज कितना स्वार्थी है? जो अपना काम निकालने के बाद फिर उस व्यक्ति की याद कर ने मैं कोई कोई दिलचस्पी नहीं रखता। अन्यथा इतने विद्वान निष्पक्ष निर्भीक पत्रकार को इतनी बदहाली में किसी वृद्धाश्रम में अपने दिन गुजारने के लिए मजबूर ना होना पड़ता। अनगिनत लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए उनका उपयोग किया होगा, लेकिन आज किसी को भी उनकी याद करने के लिए कोई समय नहीं मिलता। यह इस देश के लिए बड़ी दुर्भाग्य की बात है। हमें इस दिशा की ओर बड़ी गंभीरता से विचार करना होगा। कभी हमारे गौरव रहे आदरणीय भदौरिया जी जैसी शख्सियत को अपने जीवन के अंतिम दिनों में किसी वृद्धाश्रम में दिन गुजारने को मजबूर ना होना पड़े। राजनेताओं के लिए तो यह चर्चित है, कि वह अपने स्वार्थ के लिए व्यक्ति का प्रयोग करके उसे हमेशा के लिए भुला देते हैं। परंतु हमारा यह समाज उस सोच के साथ कतई खड़ा नहीं होता है, जो केवल स्वार्थ में अंधे होकर नरेश भदौरिया जैसी महान कथाकार के प्रति संवेदनहीन हो जाए। आज मैं इस समाज के तमाम जिम्मेदार लोगों पत्रकारों समाजसेवियों तथा बुद्धिजीवियों से यह विनम्र अपील एवं प्रार्थना जरूर करना चाहूंगा, कि वह एक बार बड़ी गंभीरता से इस विषय पर विचार करें, तथा समाज के चौथे स्तंभ के रूप में चर्चित पत्रकार के प्रति अपने कुछ दायित्वों का निर्वहन अवश्य करें, ताकि पूरे जीवन पत्रकारिता में खपा देने वाले समाज के लिए मर मिटने वाले निर्भीकता पूर्वक राजनेताओं एवं अधिकारियों को समाज जनता की सेवा के लिए मजबूर करने वाले पत्रकार कि किसी न किसी रूप में सहायता अवश्य करें। एक शिष्य होने के नाते वृद्धाश्रम जाकर समय-समय पर उनकी देखभाल व सहायता अवश्य करने का संकल्प लेता हूँ। मैं विश्वास करता हूँ कि श्री नरेश भदौरिया को जानने और पहचानने वाले लोग मेरी इस विनम्र प्रार्थना पर अवश्य ध्यान देने का कष्ट करेंगे। *स्वामी शरण श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार एवं जिला अध्यक्ष ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन उत्तर प्रदेश जनपद इटावा।*
एक टिप्पणी भेजें
If You have any doubts, Please let me know