■ *ग्राम बेला की राजेश्वरी बाल्मीक द्वारा पेट की खातिर हाथों से बजबजाती परनाली की गंदगी साफ करना समाज व सरकार के मुंह पर तमाचा*
घनश्याम सिंह
औरैया
महा दुर्भाग्य की बात कि हमारी सरकार द्वारा गरीबों दलितों व जरूरतमंदों के लिए बनायी नित नई योजनाएं धरातल पर नहीं पहुंच पाती हैं,सम्बंधित अधिकारियों व सफेदपोश जनप्रतिधियों की मिलीभगत से सरकार की योजनाएं धरातल के ऊपर दम तोड़ती चल रही हैं, अपने व बच्चों का पेट पालने के लिए चंद रुपए की खातिर बाल्मिक समाज की निहायत गरीब व सबसे अंतिम पायदान पर जीवन यापन करने वाली महिला द्वारा हाथों से बजबजाती परनाली साफ करना इसका सबूत है,क्या आप बता सकते हैं कि सरकार की बनाई योजनाएं वास्तव में धरातल पर चल रही या या हवा में हिचकोले व गोते लगाते दम तोड़ रही हैं,हमें तो लगता है कि सरकार की कल्याणकारी योजनाएं जमीन पर चलने की वजह वास्तव में ऊपर चल रही हैं, आप देख सकते हैं कि जनपद औरैया के कस्बा बेला में राजेश्वरी पत्नी पुत्ती लाल बाल्मीक अपना व बच्चों का पेट पालने के लिए कस्बे में बज बजाती गंदगी को हाथ से साफ करने पर मजबूर हैं, राजेश्वरी बाल्मीक बताती हैं कि उनके व पति के पास परिवार के भरण-पोषण का कोई भी रोजगार नहीं है न ही कोई आवासीय कृषि योग्य जमीन है न ही उन्हें किसी प्रकार की पेंशन या अन्य सरकारी सहायता मिलती है, वह खुले आसमान के नीचे कस्बे की पेयजल टंकी परिसर में वर्षों से रहने पर मजबूर हैं,बर्रु रोड पर स्थापित पेयजल टंकी परिसर ही उनका एक मात्र थिकनग है, विगत वर्ष उनकी झोपड़ी में अज्ञात कारणों से आग लग गई थी जिसे उनके घर की जो भी छोटी गृहस्थी थी आग के हवाले हो गई थी, राजेश्वरी बाल्मीक ने बताया कि उनके पति का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है और वह भी अस्वस्थ रहती हैं किंतु पेट की खातिर वह और उनके पति कस्बे की दुकानों पर व सड़कों पर चंद रुपयों की खातिर झाड़ू लगाते हैं, इस कार्य में उनकी बेटियां भी उनकी मदद करती हैं,उन्हें किसी प्रकार की सरकारी सहायता नहीं मिलती है,पूरा राशन भी नहीं मिलता है,उन्होंने बताया कि उन्होंने कई बार आवास व कृषि योग्य जमीन के लिए गुहार लगाई पर किसी ने नहीं सुना, सवाल यह है कि पिछली सरकार में सफाई कर्मियों की गैर परंपरागत नियुक्तियां हुई थी उनमें से तमाम पहुंच और पैसे वालों ने आवेदन कर सम्बंधित अधिकारियों की मिलीभगत व महान अनुकंपा से नौकरियां हथिया लीं, जो कागजों में सफाई कर्मी की नौकरी कर रहे हैं ,जब कि हकीकत यह है आज तक मात्र कुछ को छोड़कर गैर परंपरागत सफाई कर्मी अपने क्षेत्र में झांकने ही नहीं गए हैं, पर उनका ग्राम प्रधानों और संबंधित अधिकारियों की मिलीभगत से नियमित रूप से वेतन निकलता है, क्या संबंधित अधिकारी और उच्च सरकार में बैठे उच्चाधिकारी नहीं जानते हैं ? इस वास्तविक व गंभीर समस्या के निदान के लिए सरकार को गैर परंपरागत सफाई कर्मियों के स्थान पर परंपरागत रूप से कार्य करने वालों को सफाई कर्मी तैनात करना चाहिए वरना ऐसे ही कागजों में सफाई व सरकारी खजाने की लुटाई होती रहेगी और ऐसे ही गांव गली और कस्बों में गंदगी के अम्बार लगे रहेंगे और नित कोविड-19,टायफाईड, विचित्र बुखार व अन्य संक्रामक बीमारियों का प्रकोप होता रहेगा।।
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