*प्रजातंत्र के चतुर्थ स्तंभ पत्रकारों पर दिनों दिन बढ़ रहे हमले प्रजातंत्र का घोर अपमान--घनश्याम सिंह वरिष्ठ पत्रकार*
■ *सरकार व सम्बन्धित अधिकारियों की चुप्पी व दोहरी नीति शर्मनाक*
■ *भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारी ही पत्रकारों का अपमान करते व कराते हैं*
"प्रजातांत्रिक व्यवस्था के तहत प्रजातंत्र के चतुर्थ स्तंभ माने जाने वाले पत्रकारिता जगत के ऊपर दिनोंदिन संकट के बादल छाते जा रहे हैं, पत्रकारों का निरंतर हो रहा शोषण प्रजातांत्रिक व्यवस्था का ही नहीं बल्कि प्रजातंत्र के अन्य तीनों स्तंभों का भी अपमान है, हमारे देश में आजादी के बाद निर्मित प्रजातांत्रिक व्यवस्था के तहत कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और प्रेस आदि प्रजातंत्र के चार स्तंभों का गठन किया गया था इन चारों स्तंभों को एक दूसरे से हाथ👋 मिलाकर राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए कार्य करना था, पर प्रजातांत्रिक व्यवस्था के गठन के बाद कुछ दिन तक प्रजातंत्र के चतुर्थ स्तंभ को काफी सम्मान दिया गया, पर इधर दशकों से देखा जा रहा है कि प्रजातंत्र का चतुर्थ स्तंभ निरंतर शोषण उत्पीड़न, उपेक्षा का शिकार हो रहा है, पहले समाचार पत्र में प्रकाशित संदर्भ को संबंधित अधिकारी सम्मान से लेते थे और उस पर अमल करते थे, पर आज कहानी उससे बिल्कुल उलट हो गई है आज समाचार पत्र में प्रकाशित किसी भी समाचार, समस्या को अनदेखा कर दिया जाता है और उसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाता है,इसके लिए केवल सम्बन्धित अधिकारी व समाज की दोषी नहीं है,प्रजातंत्र के अन्य स्तंभ भी कहीं दोषी हैं, ध्यान देने की प्रबल आवश्यकता है कि इस प्रजातांत्रिक व्यवस्था के चतुर्थ स्तंभ में अगर एक स्तंभ कमजोर पड़ जाएगा तो क्या अन्य तीनों स्तंभ समुचित तरीके से कार्य कर पाएंगे ? यह अन्य तीनों स्तंभों को भी सोचना होगा कि प्रजातंत्र के चतुर्थ स्तंभ की मर्यादा भंग न ,हो मित्रों ! अत्यंत दुख होता है कि आज प्रजातंत्र में प्रजातंत्र के चतुर्थ स्तंभ पत्रकारिता जगत पर संकट के बादल छाए हुए हैं इसके पीछे केवल समाज समुदाय जिम्मेदार नहीं है बल्कि हमारे प्रकाशन संस्थान, व संपादन मंडल भी जिम्मेदार हैं आज प्रजातंत्र के चतुर्थ स्तंभ के संचालक समाचार पत्र को केवल उद्योग और उससे जुड़े पत्रकारों का दुःख दर्द नहीं समझते हैं, हमारी पिछली सरकारों ने पत्रकारों के लिए तमाम कल्याणकारी योजनाएं बनाईं पर न जाने किस दबाव में पत्रकारों के लिए बनाई गई कल्याणकारी योजनाओं को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका, हमें ध्यान है कि एक बार हम व हमारे पत्रकार साथी वरिष्ठ समाजसेवी कुशल राजनीतिज्ञ राम कृपाल सिंह भदोरिया के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह जी से लखनऊ भेंट करने गए थे तब हमारे पत्रकार साथियों के प्रतिनिधि मडल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह जी को ज्ञापन देकर पत्रकारों को वेतन, चिकित्सा तथा शस्त्र लाइसेंस आदि की मांग उठाई थी, इस मौके पर राजनाथ सिंह जी ने पत्रकारों से मधुर व्यवहार कर सम्मान उनकी बात सुनी और उन्हें सम्मान दावत दी, इसके बाद उन्होंने पत्रकारों की मांगों पर विचार करने के लिए अधिकारियों को निर्देशित किया था इत्तेफाक से बाद में उनकी सरकार चली गई और पत्रकारों की मांगों को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका, दुर्भाग्य का विषय है कि आज का पत्रकार दिन रात समाज, समुदाय व सरकार की सेवा करता है और जब उसके ऊपर संकट आता है कोई नहीं सुनता है, देखा जा रहा है कि समाचार प्रकाशन से खिन्न होकर तथाकथित संबंधित अधिकारी अपराधियों की मिलीभगत से पत्रकारों का शोषण,हनन करने से नहीं चूकते हैं, हमें यह बात कहते हुए अपने ऊपर भी हुए दुर्व्यवहार की याद आती है कि एक पूर्व थानाध्यक्ष ने एक साथी के ही दिग्भ्रमित करने पर बेवजह मेरे साथ इतनी बड़ी बदसलूकी की थी आज वह दुर्व्यवहार याद कर मुझे अत्यंत कष्ट का अनुभव होता है, एक अन्य मामले में एक पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी ने जनपद कन्नौज में जब हम उससे एक मामले में वस्तुस्थिति से अवगत कराने गए तो उसने वस्तु स्थिति से बिल्कुल विपरीत तथ्य बता कर हमें अपमानित किया, अपने साथियों आपको बताना चाहता हूँ कि वे गंभीरता व ईमानदारी से सोच समझ कर कार्य करें और बेवजह कर्तव्य सीमा से बाहर जाकर कार्य ना करें हमारी इतनी लंबी पत्रकारिता की करीब 40 वर्षों की सेवा के बावजूद आज तक किसी अधिकारी से विवाद तू तूने मे तक नहीं हुई जिसके चलते तमाम शालीन, स्वच्छ अधिकारियों ने मेरे कार्य की कई अवसरों पर प्रशंसा की और कई ऐसे अधिकारियों ने अराजक तत्वों से लोहा लेकर मेरे सम्मान की सुरक्षा की, मेरा कहने का यह आशय है कि ईश्वर ने आपको समाज के कल्याण के लिए कलम दवात सौंपी है,तुम्हें स्वच्छ व सुरक्षित पत्रकारिता करनी है,भूल मत जाना ! आज पत्रकारिता पर स्वार्थ के संकट के काले बादल छा गए हैं जिसके चलते प्रजातंत्र के चतुर्थ
स्तंभ की दशा बद से बदतर होती जा रही है, पत्रकारिता का गिरता स्वरूप भी पत्रकारों को नुकसान पंहुचा रहा है ऊपर से असामाजिक अराजक तत्व व अधिकारियों की मिलीभगत उन पर भारी पड़ रही है, जब समाज समुदाय या संबंधित अधिकारियों को आवश्यकता होती है तो पत्रकारों का प्रयोग किया जाता है और स्वार्थ सिद्धि के बाद उन्हें डिस्पोजल की तरह फेंक दिया जाता है, मैं दावे के साथ कहता हूं और सर्वविदित भी है जो लोग कर्तव्यनिष्ठ नहीं है एड़ी से चोटी तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं वे ही पत्रकारों का अपमान करते हैं वरना अच्छे लोग उनका सम्मान करने से नहीं चूकते हैं, आज समाज की यह दशा है की जब उन पर कोई संकट आता है तो पत्रकारों की सेवाएं ली जाती हैं, इससे दोषी व संबंधित अधिकारी नाराज हो जाते हैं जो अधिकारी अपनी कर्तव्य निष्ठा का ठीक से पालन नहीं करते हैं वही असामाजिक तत्वों को बढ़ावा देते हैं, समाज और समुदाय पत्रकारों से अपनी पीड़ा व्यक्त करके समाचार पत्र या अन्य माध्यमों में प्रकाशित कराता है, इससे संबंधित अधिकारी व दोषी पक्ष अपना भारी अपमान समझता है और कहीं ना कहीं पत्रकार को क्षति पहुंचाने का काम करता है जब पीड़ित मीडिया कर्मी न्याय मांगने के लिए अधिकारियों के पास जाता है तो अधिकारी भी नहीं सुनते हैं क्योंकि वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के स्वार्थ तले दबे होते हैं और जो अधिकारी वह कर्मचारी इमानदार होता है, वह हर संभव पत्रकार की सहायता व सम्मान करता है,
मित्रों अब हम इस समस्या के दूसरे पहलू पर भी विचार करेंगे दूसरा पहलू है प्रजातंत्र के चतुर्थ स्तंभ से जुड़े पत्रकारों के शोषण उत्पीड़न और अपेक्षा के पीछे कहीं हम भी तो दोषी हैं, हमें इस बात से परहेज करना होगा कि हम अपने कर्तव्य का ठीक से पालन करना सीखें, आज हमें कष्ट होता है कि हम मूल पत्रकारिता से हटकर कार्य कर रहे हैं,हम सरकारी कार्यक्रमों, सफेदपोश नेताओं की उपलब्धियां व अपराध जगत से जुड़े समाचारों को पत्रकारिता समझते हैं, हमने देखा है कि हमारे साथी बिना बुलाए मेहमान की तरह की सरकारी कार्यक्रम सफेदपोश नेताओं के कार्यक्रमों में पहुंच जाते हैं ठीक हम किसी के कार्यक्रम में बिना बुलाए न जाकर हमें अपने गरिमा और गौरव का भी ख्याल रखना चाहिए, विवादित अपराध जगत को बढ़ावा देने वाले समाचारों, निरर्थक वक्तव्य से भी बचना होगा, कभी कभार हम देखते हैं कि समाज- समुदाय में दो वर्गों में संघर्ष हो जाता है और हम एक पक्ष को सुनकर समाचार प्रकाशन कर देते हैं ऐसी स्थिति में हम विवाद के केंद्र बन जाते हैं जबकि संबंधित पक्ष स्वार्थ के वशीभूत होकर एक हो जाते हैं लेकिन पत्रकार दोषी पक्ष की आंख का हर समय किरकिरा बना रहता है, हम पत्रकार साथियों को भी गलत समाचार, विचार, व्यवहार से भी बचाव रखना चाहिए, सोचने वाली बात है जब हम कहीं ना कहीं गलत काम करेंगे तो हम दूसरे को सुधारने की कैसे सोच सकते हैं, पत्रकार साथियों ज्यादा समय बर्बाद करने की आवश्यकता नहीं है समय रहते पत्रकारों को भी एक जुट होना होगा, कहने को तो आज पत्रकारिता जगत में तमाम संगठन हैं पर सब अपने-अपने में मस्त हैं, आज संकट को दृष्टिगत रखते हुए सभी पत्रकार संगठनों को एक होना होगा और हमें भी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में भागीदारी के लिए आवाज बुलंद करनी होगी, तुम्हें संगठित होकर संस्थान,समाज,समुदाय व सरकार तक अपने अधिकारों को मांगना होगा, हम व हमारे वरिष्ठ साथी आपके साथ हैं।।
--घनश्याम सिंह वरिष्ठ पत्रकार
(न्यू आदर्श श्रमजीवी राष्ट्रीय पत्रकार संघ उप्र)
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