अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर सृष्टि की सृजक नारी को शत-शत नमन
उत्तर प्रदेश न्यूज21संवाददाता
"निसंदेह नारी सम्पूर्ण सृष्टि की आधार शिला है,सोचने की बात है कि यदि स्त्री सम्पूर्ण सृष्टि की आधार शिला है तो उसका समाज,समुदाय व संसार में समुचित सम्मान क्यों नहीं है।हमें हृदय से विचार करना होगा कि यदि स्त्री का समाज,समुदाय,संसार में यूं ही शोषण,उत्पीड़न होता रहेगा तो कैसे चलेगी हमारी सृष्टि,क्या सृष्टि के सफल संचालन के लिए समाज,समुदाय,संसार के पास क्या कोई दूसरा उपाय है।यदि नहीं तो समाज,समुदाय, संसार को सोचना होगा कि आज स्त्री और पुरुष में भेदभाव क्यों है,वैसे समाज में सदियों से इस समस्या पर विचारों की जंग लड़ी गई, बड़ी-बातें कीं गईं, कानून बनाये गए पर रहे ढाक के तीन ही पात,जागो!समाज,समुदाय,संसार के ठेकेदारों और कब करोगे इस पर दृष्टिपात,
कि हम भलीभांति जानते हैं कि स्त्री हमारी जननी है,उसने मां की कोख़ से संसार में कदम रखते ही जुल्म-ज़्यादती सहन करना सीखा, उसके जन्म होने पर शहनाई नहीं बजी,मिठाई नहीं बटी,खुशियों की किलकरियां नहीं गूंजी,शिक्षा व सम्मान में उसका हक़ नहीं मिला,उसकी शादी के लिए पिता व भाई को दर-दर की ठोकरें खानी पड़तीं, मोटा दहेज़ देकर पिता बेटी के हाथ पीला करता,फिर भी ससुराल की दहलीज़ पर कदम रखते ही उसका शोषण,उत्पीड़न किया जाता, इतना ही नहीं बेटी को दहेज़ की बलिवेदी पर चढ़ा दिया जाता है,बहन-बेटियों के साथ जोर-जबरदस्ती की जाती है और हमारा समाज,समुदाय,संसार उसके ठेकेदार,कानून कुछ कारगर कदम नहीं उठा पाते समाज की विभेदकारी नीतियों का ही परिणाम है कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियों को बेहतर शिक्षा,रहन-सहन सहानुभूति की सुविधा सुलभ नहीं होती।
"ओ सभ्य समाज के लोगों देखो,दुनियां की प्रत्येक वस्तु बदल चुकी है,तुम भी बदलो!
" *बदल गए रवि क्षिति जल पावक*,
*बदल न पाई मानवता है।*
*लीख पीटता मानव देखो,*
*हुंकार भर रही मानवता है।।*
(निज काव्य ग्रंथ से)
"आज हमारे समाज में स्त्री-पुरुष समानता के नाम पर बजाया जा रहा ढ़िढोरा सरासर ढपोल शंख साबित हो रहा है,समाज में आज तेजी से महिलाओं, बेटियों का अनुपात गिर रहा है,गांवों,कस्बों में कुंआरों की फौज बढ़ रही है,अगर ज़ल्दी ही हम नहीं चेते तो वह दिन दूर नहीं होगा जब स्त्री विलुप्त होने की कगार पर पंहुच जाएगी,ऐसी विषम परिस्थिति को देखते हुए मेरा विश्व समुदाय से आवाहन है कि समाज में स्त्री पुरुष के बीच पनपी भेदभाव की खाई को पाटने के लिए तत्काल उठ खड़े हों,प्रत्येक स्त्री-परुष पूर्णतयः समान हैं, स्त्री-पुरुष समानता के संदर्भ में
"हमने बहाई धर्म की पवित्र पुस्तकों में पढ़ा है जिसमें बहाई धर्म के संस्थापक "बहाउल्लाह"
स्त्री-पुरुष को एक ही पंछी के दो पंख बताया है,यह उदारण हमें बड़ा प्रासंगिक लगा,जिसमें यह भी बताया गया कि जिस तरह ऊंची उड़ान भरने के लिए पंछी के दोनों पंखों का मजबूत होना जरूरी है,इसी तरह समाज के विकास के लिए स्त्री-पुरुष का समान होना जरूरी है"
इसी तरह भारतीय वांग्मय में *"यत्र नार्यस्तु पूजन्यते रमन्ते तत्र देव:
"स्त्री पुरुष समानता का महत्वपूर्ण उल्लेख किया गया है
हम सब सभ्य समाज के लोग इन सब उदाहरणों को क्यों अनदेखा कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं ?
स्त्री-पुरुष असमानता की इस समस्या के समाधान के लिए स्त्री-पुरुष को समन्वित प्रयास भी करना चाहिए, क्यों कि इस समस्या के लिए केवल पुरुष ही उत्तरदायी नहीं है,सोचना होगा क्या एक स्त्री के उत्पीड़न में स्त्री का हाथ नहीं होता है ? अपने अस्तित्व के लिए हमारी बहनों को बेटी,बहू और सास की समानता पर भी विचार करना होगा -
" *नारी यदि महान हो नर से,*
*तुम निर्भय हो संधान करो*
*नर कुल दोष विहीन बने,*
*परिवर्तित ब्रह्म विधान करो*
--निज काव्य ग्रंथ से
एक टिप्पणी भेजें
If You have any doubts, Please let me know