आज जब हम इक्कीसवीं सदी की दहलीज़ पर खड़े है खुद को पढ़े लिखे ओर खुले विचारों वाले समझ रहे है तब भी सब खुद के भीतर कहीं ना कहीं कितने सारे अंधविश्वास को पाल कर बैठे है हम शायद इन सारी बातों के पीछे बेबुनियाद डर छुपा होता है इंसान चाहे कितना भी बहादुर हो हंमेशा एक भय से लिपटा रहता है और यही वजह रही होंगी इन सारे अंधविश्वासों को पोषने की।
कभी-कभी एक पीढ़ी का पाखंड दूसरी पीढ़ी के लिए परंपरा बन जाता है, आने वाली पीढ़ी को इस अंधविश्वास भरी रस्मो से परे रख सके तो बेहतर होगा .!
ये किसी खास दिन खास समय पर चौराहा पार करने पर जो अटकलें होती है दर असल क्या है?
चौराहे पर लोग नींबू काटकर क्यों रखते हैं? क्या चौराहे पर रखे टोटको को ठोकर मारने वाला मुसिबत में पड़ जाता है?
सच मानिये एसा कुछ भी नहीं होता मेरे तो कई बार अन्जाने में एसी चीज़ों पर पैर पड़े है, ज़िंदा हूँ आज भी खुश हूँ ओर सुखी भी।
एसे कई अंधविश्वास के बारे में बता रही हूँ यहाँ जो की बिलकुल बचकाने है।
कोई साबित करके दिखाएं की ये सब करने से अनर्थ होता है।
आप बिल्ली के रास्ता काटने पर क्यों रुक जाते हैं?। जाते समय अगर कोई पीछे से टोक दे तो आप क्यों चिढ़ जाते हैं? किसी दिन विशेष को बाल कटवाने या दाढ़ी बनवाने से परहेज क्यों करते हैं?
क्या आपको लगता है कि घर या अपनी दुकान या ऑफिस के बाहर नींबू-मिर्च लगाने से बुरी नजर से बचाव होगा?
कोई छींक दे तो आप अपना जाना रोक क्यों देते हैं?
घर से बाहर निकलते वक्त अपना दायां पैर ही पहले क्यों बाहर निकालते हैं?
जूते-चप्पल उल्टे हो जाए तो आप मानते हैं कि किसी से लड़ाई-झगड़ा हो सकता है? रात में किसी पेड़ के नीचे क्यों नहीं सोते?
रात में बैंगन, दही और खट्टे पदार्थ क्यों नहीं खाते? रात में झाडू क्यों नहीं लगाते और झाड़ू को खड़ा क्यों नहीं रखते?
अंजुली से या खड़े होकर जल नहीं पीना चाहिए। क्या बांस जलाने से वंश नष्ट होता है।
शनिवार को लोहा, तेल, काली उड़द आदि नहीं खरीदना चाहिए। मंगलवार को नाखून काटना गलत है। चंद्र या सूर्य ग्रहण में बाहर नहीं निकलना चाहिए। इन्टरव्यू देने जाते वक्त या कोई परिक्षा देने जाते वक्त दही शक्कर खिलाना।
शुभ प्रसंग पर काले रंग से परहेज़
लड़की का माहवारी के दिनों में मंदिर में ना जाना। एसे तो असंख्य तर्को से जूझते है हम।
एसे ढ़ेरों अंधविश्वास है जिसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। मुझे तो इन सारी बातों के पिछे क्या लॉजिक है आज तक समझ में नहीं आया। शायद ये सारी चीजें कीसी ना किसी के साथ इत्तेफ़ाक़ से हुई हो और ज़ाहिर कर दिया हो की एसा करने से वैसा होता है, और परंपरा गत जैसे सारी बातें होती है वैसे ये सब भी प्रस्थापित होता गया हो।
बाकी कोई ठोस या वैज्ञानिक तथ्य इन सारे अंधविश्वासों में नहीं छुपा।
क्यूँ आख़िर बिना कोई तथ्य वाली बातों को दोहराते चले जा रहे है हम ?
सहज ज़िंदगी को अटपटी बना रहे है।
कोई तो हिम्मत करो इन खोखली रवायतों को तोडने की।।
भावना ठाकर #भावु
बेंगलोर, कर्नाटक

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