‘बार्डर’, ‘एलओसी’, ‘राजी’, ‘उरी’ या ‘केशरी’ जैसी फिल्मे देख कर देश के जवानों के सम्मान में हमारा सिर झुक जाता है। भावनाओं में बहते हूए उस समय एक क्षण के लिए हमें यही लगता है कि वाह! जिंदगी तो ये लोग आन, बान और शान के साथ जी गए। हम तो किसी काम के नहीं हैं। लेफ्रिटनेंट कर्नल मिताली मधुमिता, दिव्या अजीतकुमार, फ्रलाइट लेफ्रिटनेंट निवेदिता, भावना कोथ या वर्तिका जेपी को आर्मी-एयरफोर्स की यूनीफॉर्म में देखने के बाद हम सभी को डिजाइनर कपड़े भी फीके लगने लगते हैं। पिछले साल चंद्रयान-2 के साथ साइंटिस्ट एम- वनिता और रितु करियाल को देख कर थोड़ी देर के लिए तो यही लगा था कि काश! हमने भी कुछ ऐसा किया होता। यार आपनी तो पूरी जिंदगी नौकरी, रसोई और परिवार को संभालने में चली गई। यह अफसोस, यह विषाद और उदासी अपने अंदर कुछ हद तक जीवित रहती है। कुछ मीनिेंगफुल करने का उत्साह अंदर पैदा करती है। यह सोच इस बात की निशानी है कि हम भी अपने देश से प्रेम हैं।
अगर मन में इतनी जाग्रति और संवेदना है तो उदास होने की जरूरत नहीं है। प्रकृति ने हर किसी की भूमिका निश्चित करके भेजा है। अब हमें उसकी तलाश करने की जरूरत है। अर्थपूर्ण काम, योग्य काम, संतोष प्रदान करने वाला काम, नाम-दाम के साथ राष्ट्र के लिए उपयोगी काम, इन सभी कामों का भी अपना महत्व है। आर्मी कैप्टन की ही तरह नर्सरी शिक्षिका का भी काम देशहित का ही काम है। अपना काम छोटा है या बड़ा, अगर वह समाज और राष्ट्र के हित के लिए, विकास के लिए और नई दिशा के लिए उपयोगी है तो उस दिशा में भी कार्यरत रहना चाहिए। अपने स्तर पर कुछ बढ़िया करने का प्रयत्न करना नहीं चाहिए।

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