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कोई दे ग़र पैग़ाम-ए- इश्क तो ये दिल- ओ- जां कुर्बान -प्रेम बजाज



कुछ तो सोचा होगा तुमने भी , तभी तो छोड़ दिया यूं मंझधार में मुझको ।
कह के चल दिये दो लफ़्ज सुखे से # सब्र करो #
कहां से लाऊं सब्र , किस के शाने पे सर रख कर दूं दिलासा अपने दिल को ।
क्यूं तुम ज़माने से डर गए , मेरी पाक मोहब्बत पर यकीं तो करते , एक बार
पलट कर तो देखा होता , मैं वहीं थी , अब भी वहीं हूं , बस इंतजार है तो तुम्हारे
पलटने का ।
तुम क्या जानो शूल चुभाती ये चादर- ए - शब , आग लगाता चांद मुझको ,
कभी हवा के किसी झोकें में पैग़ाम -ए- खुशबु जो आ जाए , चश्म-ए-नम में
में तेरी तस्वीर नज़र आती है ।

हो गई है नफ़रत अब तो चांदनी से हमें , तारे भी ना भाते हमको , जब- जब जलते
चिराग तो संग उनके जिया हमारा जलता ‌।
खेलती है मेरे जिस्म पर जब ये बारिश की बूंदें , महसूस कराती तुम्हारी छुअन का एहसास मुझे ,
ठण्डी के मौसम में भी लगा जाती तन-बदन में आग ये ।
तगादा करते नैन मेरे , ख़्वाब में ही दिख जाए झलक जो तुम्हारी तो शब-ए-बरात हो जाए ।
कोई दे ग़र पैग़ाम-ए- इश्क तो ये दिल- ओ- जां कुर्बान उस पे हो जाए ।
हैं फक़त इतनी सी इल्तज़ा ग़र आना तो दमे- आखिर  से पहले आना , कहीं
दीदार को तरसते ना रहे जाए मेरे नयना ।

 ए दुनियां वालों मेरा ज़नाज़ा , कुचा -ए-यार से  निकालना , जाते-जाते शायद दिख 
जाए दिलदार की छब का नज़ारा , वरना रूह संग भटकेगा दिल भी बेचारा ।
उफ्फ़ जब निकलेगा ज़नाज़ा हमारा ,ग़र यार ने दिया होगा रकीबों को बाहों का सहारा ,
 देख कर ये मंज़र कांप जाएगी रूह और तड़प उठेगा मुर्दा जिस्म हमारा , कैसे भला 
देखें रूह हमारी वो नज़ारा , तौबा इश्क से  यकीं उठ जाएगा हमारा ।


मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर ) 


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