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भारत मे, आरक्षण की प्रथा सदियों पुरानी थी . कभी किसी रूप मे तो

                           भारत में आरक्षण की समस्या....
                                 उत्तर प्रदेश न्यूज़ 21
उप संपादक अनुराग सिंह ........✍
भारत मे, आरक्षण की प्रथा सदियों पुरानी थी . कभी किसी रूप मे तो, कभी किसी रूप मे, दलितों का शोषण होता है. दलित वर्ग के लोगो को, कभी सम्मान नही देना उनका अपमान करना . उन्हें आजादी से, उठने बैठने तक की स्वतंत्रता नही थी . इसके लिये डॉ भीमराव अम्बेडकर ने, सबसे पहले दलितों के लिये आवाज उठाई और उनके हक़ की लड़ाई लड़ी, तथा उनके लिये कानून बनाने की मांग की, व उनके लिये कानून बनाये गये. ऐतिहासिक तथ्यों और पुरातात्विक स्त्रोतों के माध्यम से, पता चलता है भारत से, आरक्षण का सम्बन्ध बहुत ही पुराना है . बस फर्क सिर्फ इतना है कि, समय के साथ इसके रूप बदलते गये. आखिर ये आरक्षण था क्या, और कहा से इसकी उपज हुई इसके मुख्य आधार क्या थे . क्या यह सिर्फ जाति के आधार पर था ? ऐसे बहुत सारे प्रश्न है जिसे हर कोई जानना चाहता है.

पहले के समय मे धर्म, मूलवंश,जाति, व लिंग यह सभी मूल आधार थे आरक्षण के. हमने बहुत सी बाते , कहानी के रूप मे सुनी है कुछ तो देखी भी है, जैसे – प्राचीन प्रथाओ के अनुसार, पंडित का बेटा पंडित ही बनेगा , डॉक्टर का बेटा डॉक्टर ही बनेगा, और साहूकार का साहूकार ऐसी, प्रथा चली आ रही थी. यह निर्धारण जाति का, उस व्यक्ति के कुल के आधार पर था. ठीक उसी प्रकार, एक महिला वर्ग जिसे, सिर्फ पर्दा प्रथा का पालन करना पड़ता था वो, अपनी जिन्दगी खुल कर नही जी सकती थी , एक महिला हर चीज़ के लिये, किसी न किसी पर निर्भर हुआ करती थी. शिक्षा और नौकरी के क्षेत्र मे, भी उच्च वर्ग का वर्चस्व फैलने लगा . इसका बहुत ही सामान्य उदहारण, हमारे घरों मे, कई बार देखने को मिलता है यदि कोई, कामवाली या नौकर भी रखा जाता है तो, रखने के पहले सबसे पहले उसकी जाति पुछी जाती है ,ऐसा क्यों ? क्या वह मनुष्य नही है ? क्या उन्हें , समानता व स्वतंत्रता का अधिकार नही है ? यह सभी आरक्षण का मूल आधार बने

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