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क्षत्रिय ब्राह्मणों की वर्चस्व की खाई पिछड़े वर्ग को मिली मलाई

*क्षत्रिय ब्राह्मणों की वर्चस्व की  खाई पिछड़े वर्ग को मिली मलाई*

*बिधूना क्षेत्र प्रमुख राजनैतिक दलों के प्रत्याशी चयन पर निर्भर करेगा चुनाव परिणाम*

*बिधूना,औरैया।* प्रमुख समाजवादी विचारक स्वर्गीय डॉ राम मनोहर लोहिया की संसदीय क्षेत्र का हिस्सा रहे 202 बिधूना विधानसभा क्षेत्र में हर बार चुनाव में जातीय समीकरण  प्रत्याशी की जीत का प्रमुख कारण बनता है। ऐसे में यहां राजनीतिक दलों के प्रत्याशी चयन पर ही चुनाव परिणाम निर्भर रहता है। 1980 के दशक के पूर्व क्षत्रिय ब्राह्मणों के बीच वर्चस्व को लेकर पैदा हुई गहरी खाई तभी से पिछड़े वर्ग के नेता इस क्षेत्र में खा रहे मलाई। सभी राजनीतिक दल यहां मजबूत वेश वोट बैंक वाले प्रत्याशी को ही अपना उम्मीदवार बनाना चाहते हैं। जिसके चलते संभावित दावेदारों द्वारा अपने-अपने दल में टिकट की जोड़-तोड़ किए जाने के बाद भी फिलहाल अधिकांश प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा अब तक अपने प्रत्याशियों के नाम घोषित नहीं किए गए हैं।
        प्रमुख समाजवादी विचारक स्वर्गीय डॉ राम मनोहर लोहिया के संसदीय क्षेत्र का हिस्सा रहा बिधूना विधानसभा क्षेत्र सपा का प्रमुख गढ़ रहा है। इस विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाले कन्नौज संसदीय क्षेत्र से समाजवादी नेता पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव , डिंपल यादव , छोटे सिंह यादव व प्रदीप यादव समेत प्रमुख समाजवादी दिग्गज काबिज रहे है। ऐसे में यह सपा का प्रमुख गढ़ माना जाता है। लेकिन पिछली भाजपा लहर में इस संसदीय व बिधूना विधानसभा सीट पर भाजपा का कब्जा हो गया है। क्षेत्र के जातीय समीकरणों के मुताबिक शाक्य समाज भाजपा के बिधूना विधानसभा क्षेत्र के मौजूदा विधायक विनय शाक्य भाजपा की राज्य सभा सदस्य गीता शाक्य को अपना नेता मानता है। वही लोधी समाज पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्वर्गीय धनीराम वर्मा की पुत्र वधू रेखा वर्मा व उनके पुत्र दिनेश वर्मा को अपना नेता मानता है। जबकि पाल समाज सतीश पाल के साथ खड़ा नजर आता है। बिधूना विधानसभा क्षेत्र में देश की आजादी के बाद लगभग 1980 के दशक तक इस सीट पर क्षत्रिय ब्राह्मण समाज के नेताओं का कब्जा रहा , लेकिन 80 के दशक के बाद यह सीट पिछड़े वर्ग के नेताओं के कब्जे में पहुंच गई , और तब से अब तक पिछड़े वर्ग के नेताओं के कब्जे में ही है।क्षेत्रीय राजनीति का बारीकी से परख करने वालों का मानना है कि इस क्षेत्र में 80 के दशक के पूर्व क्षत्रिय ब्राह्मण नेताओं के बीच वर्चस्व को लेकर उभरे मतभेद से पैदा हुई खाई आज तक नहीं पट सकी है। वही अपने को अधिक बुद्धिजीवी मानने वाला क्षत्रिय , ब्राह्मण समाज में गांव- गांव नेता हो जाने से इस समाज को अधिकांश राजनीतिक दल कमजोर मानकर तरजीह नहीं देते है। जबकि यदि आज भी क्षत्रिय , ब्राह्मण समाज अपनी ताकत पहचान ले तो पुनः इस खोई सीट को हासिल करना कोई मुश्किल बात नहीं हो सकती। यहां के सवर्ण समाज के नेता लगभग सभी दलों में जुड़े हुए हैं। ऐसे में क्षत्रिय ब्राह्मण समाज इस सीट पर अपनी खोई प्रतिष्ठा बचाने में कामयाब नहीं हो पा रहा है। इस बार के संभावित चुनाव को लेकर सभी दलों में तमाम संभावित दावेदारों द्वारा टिकट की जोड़तोड़ की जा रही है , लेकिन फिलहाल भाजपा , सपा व कांग्रेस द्वारा अपने प्रत्याशी की घोषणा नहीं की गई। इन दलों के नेता जातीय मजबूत वोट बैंक के प्रत्याशी की तलाश की कवायद में जुटे बताए जाते हैं। इनमें सपा , भाजपा , बसपा व कांग्रेस के साथ लगभग सभी दल येन केन प्रकारेण इस सीट को अपने कब्जे में रखने के प्रयासों में है। फिलहाल देखने में आ रहा है कि मुस्लिम समाज भी इस बार भाजपा के खिलाफ किसी एक  दल के पक्ष में खड़े होने के मूड में है , लेकिन इतना जरूर है कि इस बार प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रत्याशी चयन पर चुनाव परिणाम निर्भर करेगा।

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