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परमीशन न मिलने से निराश हुए बाल्मीक समाज के लोग

*परमीशन न मिलने से निराश हुए बाल्मीक समाज के लोग* 

*फफूंद,औरैया।* बुधवार को रामलीला ग्राउंड के पीछे वाल्मीकि मंदिर से शुरू होकर नगर मे हर साल जलूस निकलता था लेकिन इस बर्ष परमीशन न मिलने के कारण बाल्मीकि समाज के लोग निराश रहे। वहीं कार्यक्रम को मंदिर परिसर मे ही बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।वहीं चेयरमैन प्रतिनिधि अनुराग शुक्ला ने 
महर्षि वाल्मीकि जयंती पर उनके चित्र पर फूल माला पहला कर आरती की। बाल्मीक जयंती शरद पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। वाल्मीक की एक घटना ने बदल दी थी जिंदगी ,
जानें डाकू से संत बनने की कहानी।
       महर्षि वाल्मीकि का जन्म अश्विन मास के शुक्‍ल पक्ष की पूर्णिमा यानी कि शरद पूर्णिमा को हुआ था। महर्षि वाल्‍मीकि का जन्‍मदिवस देशभर में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार वैदिक काल के महान ऋषि वाल्‍मीकि पहले डाकू थे लेकिन जीवन की एक घटना ने उन्हें बदलकर रख दिया. वाल्‍मीकि असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे शायद इसी वजह से लोग आज भी उनके जन्मदिवस पर कई विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। 
डाकू से म‍हर्षि वाल्‍मीकि बनने की कहानी- वाल्मीकि का जन्म महर्षि कश्यप और अदिति की 9 वीं संतान वरुण और पत्नी चर्षणी के घर हुआ था। बचपन में भील समुदाय के लोग उन्हें चुराकर ले गए थे , और उनकी परवरिश भील समाज में ही हुई।वाल्मीकि से पहले उनका नाम रत्नाकर हुआ करता था। रत्नाकर जंगल से गुजरने वाले लोगों से लूट-पाट करता था। एक बार जंगल से जब नारद मुनि गुजर रहे थे , तो रत्नाकर ने उन्हें भी बंदी बना लिया। तभी नारद ने उनसे पूछा कि ये सब पाप तुम क्यों करते हो? इस पर रत्नाकर ने जवाब दिया, 'मैं ये सब अपने परिवार के लिए करता हूं'। नारद हैरान हुए , और उन्होंने फिर उससे पूछा क्या तुम्हारा परिवार तुम्हारे पापों का फल भोगने को तैयार है। रत्नाकर ने निसंकोच हां में जवाब दिया। तभी नारद मुनि ने कहा इतनी जल्दी जवाब देने से पहले एक बार परिवार के सदस्यों से पूछ तो लो। रत्नाकर घर लौटा और उसने परिवार के सभी सदस्यों से पूँछा कि क्या कोई उसके पापों का फल भोगने को आगे आ सकता है? सभी ने इनकार कर दिया. इस घटना के बाद रत्नाकर को काफी दुखी हुआ और उसने सभी गलत काम छोड़ने का फैसला कर लिया. इसके बाद वो राम के परम भक्त बन गए. वर्षों की तपस्या के बाद वो इतना शांत हो गए कि चींटियों ने उनके चारों ओर टीले बना लिए. इसलिए, इन्हें महर्षि वाल्मीकि की उपाधि दी गई, जिसका अर्थ होता है 'चींटी के टीले से पैदा हुआ.इस मौके पर माहराज कमल शाह, माहराज लाल सहाय, सेवा सहाय,अमर सहाय, अध्यक्ष प्रदीप बाल्मीक, कोषाध्यक्ष मुकेश बाल्मीक, उपाध्यक्ष संजय खरे, रामू, शैलेंद्र, मनोज, मंगल, राहुल खरे, मुन्ना, मनोनीत सभासद अनिल बाल्मीक आदि लोग मौजूद रहे।वहीं सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस प्रशासन मौजूद रहा।

 

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