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*प्रख्यात संस्था बुलंदी "जज्बात ए कलम" की अगुवाई में अंतरराष्ट्रीय वर्चुअल महाकाव्य सम्मेलन आयोजित*


■ *देश-विदेश के सात सौ से अधिक साहित्यकारों ने अनवरत रूप से काव्य पाठ कर अनोखा कीर्तिमान स्थापित किया*
 ■ *औरैया के त्रिभाषी साहित्यकार व वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम सिंह ने भी प्रस्तुत कीं लोक कल्याणकारी रचनाएं:हुई ख़ूब सराहना*
औरैया
बुलंदी "जज्बात एक कलम" प्रख्यात संस्था की अगुवाई में अंतरराष्ट्रीय वर्चुअल महाकाव्य सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें देश व विदेश के सैकड़ों साहित्यकारों ने अपनी साहित्यिक रचनाएं प्रस्तुत करते हुए वैश्विक स्तर पर आवाज बुलंद कर एक अनोखा कीर्तमान स्थापित किया।।
प्रख्यात संस्था बुलंदी जज्बात एक कलम
के संस्थापक व उत्तराखंड के युवा कवि विवेक बादल बाजपुरी के दिशा निर्देशन में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय महा वर्चुअल कवि सम्मेलन में वरिष्ठ कवि ऋषि कुमार शर्मा समेत पूरे भारतवर्ष के अतिरिक्त सऊदी अरब, कनाडा, जर्मनी, नेपाल, कैलिफोर्निया, आबू धाबी, दोहा, कतर, सिंगापुर, बेल्जियम आदि तमाम देशों के प्रमुख साहित्यकारों ने प्रतिभाग करते हुए अनवरत रूप से एक से एक बढ़कर रचनाएं प्रस्तुत कीं, यह अंतरराष्ट्रीय वर्चुअल महा कवि सम्मेलन निर्धारित 150 घंटे की अपेक्षा करीब 200 घंटे व 5 दिन की अपेक्षा करीब 8 दिन तक चला, इस वैश्विक वर्चुअल महाकवि सम्मेलन के अंतिम दिन औरैया के वरिष्ठ पत्रकार व त्रिभाषी साहित्यकार घनश्याम सिंह
को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया, इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार व त्रिभाषी साहित्यकार घनश्याम सिंह ने समाज,समुदाय व संसार में विनाश का पर्याय बने "नशा" पर प्रहार करते हुए     
"जो  नाश  कर डाले स्वयं  को ऐसा नशा क्या ? 
     हाथ क्यों डाले गले में देखो रह गया अब शेष क्या?
     ऐसी मौज को छोड़ो जो हमको मेटती हो ।
     मजे में मौत को भूले ना हमको सूझती हो ।।
    ए दुनिया छोड़ मदिरा को ये मंदिर कह रही है।
     मैं त्याज्याज्य कुपेय कसम जो गंगा बह रही है।।
             उन्होंने नशा पान पर ही आधारित दूसरी रचना 
"सुनो भाइयों कान खोल कर मदिरा की परिभाषा।
 जो पावन मानव युग को है देती नित्य निराशा ।।
मद्यपान और धूम्रपान की जड़ में ऐसी ज्वाला है।
 तन मन धन शोषित होते, किस में नर मतवाला है।।
 मदिरा धूम्रपान के साधन भैया खूब जानते हो।
 लेकिन किस उन्माद में पड़कर नहीं मानते हो ।।
          उन्होंने "नारी जीवन" पर भावपूर्ण  प्रस्तुति
"नारी का क्यों दुख में जीवन क्यों गुलाब में हैं कांटे।
 उस नारी का भाग्य हाय जो रोज दुखों से लड़ती रहती।
 सारे जीवन वह टकराकर अपने व्रत का पालन करती।।
 कठिन कार्य कर निज कर से भी तनक नहीं वह नारी थकती।
 भेदभाव भी सबका सह कर सुबक-सुबक दुख रजनी काटे ।।
की भावपूर्ण प्रस्तुति करते हुए वाहवाही बटोरी। 
फ़ोटो- काव्यपाठ करते औरैया के वरिष्ठ पत्रकार व त्रिभाषी साहित्यकार घनश्याम सिंह

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