आरक्षण की आग में जलता देश का युवा भविष्य - सतेन्द्र सेंगर "राष्ट्रीय अध्यक्ष" मीडिया अधिकार मंच भारत
आजकल देश में राजनैतिक मुद्दों की बात की जाये तो सबसे ज्यादा बड़ा मुद्दा जातिवाद के आरक्षण को लेकर हर जाति धर्म के लोग अपनी अपनी जाति के आरक्षण के लिये संघर्ष कर रहे है,
जातिवाद के आरक्षण की लड़ाई में सम्पूर्ण भारत के युवाओं का भविष्य चौपट हो रहा है, जबकि देश का वास्तविक बिकास तब तक सम्भव नहीं हो सकता जबतक लोक तन्त्र के चारों स्तम्भों में समानता का संविधानिक अधिकार नहीं होगा
जब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मजबूत होगा तभी विकसित राष्ट्र बनेगा -
लोक तन्त्र का प्रथम प्रहरी के नाम से जाने जाना वाला पत्रकार जिनकी पत्रकारिता का मूल उद्देश्य यही है कि सूचनाये देकर समाजिक जागरूकता करना , शिक्षित करना तथा मनोरंजन करना है। इन तीन उद्देश्यों में सम्पूर्ण पत्रकारिता का सार तत्व समाहित किया जा सकता है। अपनी बहुमुखी प्रवृतियों के कारण पत्रकारिता व्यक्ति और समाज के जीवन को गहराई तक प्रभावित करती हैं।
एक सवाल पत्रकारिता का उद्देश्य क्या है?
पत्रकारिता का उद्देश्य हैकि सच्ची घटनाओं पर प्रकाश डालना है, वास्तविकताओं को सामने लाना है। वहीं बाबासाहेब डॉ बी आर अंबेडकर के अनुसार, 'पत्रकारिता के तीन उद्देश्य हैं- पहला जनता की इच्छाओं, विचारों को समझना और उन्हें व्यक्त करना है। दूसरा उद्देश्य जनता में वांछनीय भावनाएं जागृत करना और तीसरा उद्देश्य सार्वजनिक दोषों को नष्ट करना है।
पत्रकारिता का मुख्य कार्य सूचनाओं को लोगों तक पहुंचाना है। समाचार अपने समय के विचार, घटना और समस्याओं के बारे में सूचना प्रदान करता है। यानी कि समाचार के माध्यम से देश दुनिया की समसामयिक घटनाओं समस्याओं और विचारों की सूचना लोगों तक पहुंचाया जाता है। इस सूचना का सीधे सीधे अधिक से अधिक लोगों पर प्रभाव पड़ता है।
वर्तमान प्रवेश पर अगर पत्रकारिता पर हम चर्चा करें तो उसका ठीक उल्टा देखने को मिलता है।
देश को आजादी दिलाने वाले महापुरुषों एवं संविधान निर्माताओ ने कभी यह नहीं सोचा होगा कि आने वाले दिनों में हम जिस लोकतांत्रिक देश की स्थापना कर रहे हैं कहीं वह पुनः गुलामी वाले समय से भी भयानक रूप धारण कर लेगा हमारी आने वाली पीढ़ी आजाद भारत की गुलाम नागरिक बन कर रह जाएगी। आज हमें तो ऐसा ही महसूस हो रहा है इसका मात्र एक उदाहरण देना चाहूंगा कि आजादी के 7 दशक बीत जाने के बाद भी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया को आज तक संवैधानिक अधिकार नहीं प्राप्त हो सका यह बहुत बड़ा सवाल है आखिर क्यों? आज देश के अंदर अपने अस्तित्व के लिए जितना किसान तड़फड़ा रहा है, रोजगार और शिक्षा के लिए जितना नौजवान और छात्र को बेचैनी है, वहीं आजाद भारत के लोग जातिवादी के आरक्षण के लिये तड़फ रहा है ठीक उसी तरह पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता आज अपने अस्तित्व के लिए अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए अपने संवैधानिक मान्यताओं के लिए संघर्ष पर संघर्ष किए जा रहा है लेकिन शासन सत्ता में बैठे हुए लोगों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रहा है। इसका मात्र यही कारण है भ्रष्टाचार कायम रहे, आजाद भारत के युवा जातिवाद में बट कर लड़ते रहे,
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