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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष

"*फ़ुरसत से बैठ ब्रह्म ने बनायी हैं ये बेटियां*,
*पापा की परी और मां की परछाई हैं ये बेटियां*।
*बहना का प्यार घर में सुखद संसार और,*
*राखी को सजाने की कलाई हैं ये बेटियां।"*

उत्तरप्रदेश न्यूज21संवाददाता
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत 8 मार्च 1908 को हुई थी जब न्यूयॉर्क शहर की सड़कों पर तकरीबन 15000 महिलाओं ने अपने अधिकारों को लेकर प्रदर्शन किया जिसमें उनकी प्रमुख मांगें थीं- कम घंटे काम, बेहतर वेतन एवम् मतदान का अधिकार।
तब से प्रतिवर्ष 8 मार्च को कई राष्ट्रों में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाते हैं।महिला दिवस का औचित्य मात्र बातें करना नहीं है अपितु हमारे समाज में विद्यमान तमाम कुरीतियों को दूर करना है। एक ओर जहां महिला सशक्तिकरण हेतु *मिशन शक्ति* जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, महिलाओं को पिता/पति की संपत्ति में बराबरी का अधिकार दिए जाने के लिए कानून बनाए जा रहे हैं, बेटियों का उत्साह बढ़ाने हेतु उनको विभिन्न उच्च पदों पर एक दिन के लिए सांकेतिक अधिकारी के रूप में नियुक्त किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर हमारे ग्रामीण, जनजातीय क्षेत्रों में महिलाएं आज भी उत्पीड़न का शिकार हैं, आज भी ये महिलाएं अपना दर्द अपने घूंघट के पीछे छिपाकर रखतीं है अत्याचार सहती रहतीं हैं लेकिन अपना दर्द किसी से कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाती क्योंकि उनको कभी किसी ने इतनी अहमियत ही नहीं दी होती है जिससे उनका आत्मबल निखर पाता।
*"मां की फटकार सही, पिता की डांट खाई है।*
*फिर भी हर हाल में मुस्कुराईं हैं ये बेटियां।*
*देती कितना प्यार ये अपने परिवार को,*
*फिर भी हम कहते हैं पराईं हैं ये बेटियां।"*
महज सरकार के प्रयासों से महिला सशक्तिकरण संभव नहीं हो सकता अपितु हम में से प्रत्येक को महिलाओं के प्रति अपने अपने मन में सम्मान रखना होगा तभी महिलायें सहज महसूस कर पाएंगी एवम्  खुद को समाज की मुख्य धारा से जोड़ पाएंगी।
जहां एक ओर महिलाओं के शोषण,कुपोषण एवम् कष्टप्रद जीवन का जिम्मेदार पुरुष प्रधान समाज को ठहराया जाता है वहीं दूसरी ओर महिलाएं भी महिलाओं के पिछड़ने के लिए उत्तरदाई हैं अतः समस्त समाज को चाहिए कि वे महिलाओं के प्रति अपना  नज़रिया बदलने का प्रयास करें। महिलाएं मात्र कहने भर को देवी तुल्य नहीं हैं बल्कि वे इस सम्मान की वास्तविक हकदार हैं।
*"समझा है हमने जिन्हें बेबस लाचार है,*
*परचम हिमालय पर लहराईं हैं ये बेटियां।*
*काटो मत पंख इनके,आजादी से उड़ने दो,*
*वायुयान भी आकाश में उड़ाई हैं ये बेटियां।"*
घर के चूल्हे - चौके से लेकर व्यवसाय हो, साहित्य जगत हो, हवाई सेवा हो,प्रशासनिक सेवा हो, विदेश सेवा हो, रक्षा क्षेत्र हो या फिर खेल का मैदान हो महिलाओं ने अपनी सफलता का परचम हर जगह लहराया है, यहां तक कि कई राष्ट्रों की राष्ट्रध्यक्ष भी महिलाएं हैं।
*"दुनिया भर की जिम्मेदारी उठाने को तैयार हैं,*
*अपने घर आंगन की शहनाई हैं ये बेटियां।*
*किसी भी परिस्थिति में धैर्य नहीं खोती हैं,*
*पद्मिनी, सावित्री, लक्ष्मीबाई हैं ये बेटियां।"*
  लेखिका🖊️
उपासना राजपूत
सहायक अध्यापिका
   औरैया (उ०प्र०)

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