वो भी बुद्ध बनना चाहती है
चाहतीं तो है वो भी बुद्ध बनना पर जिम्मेदारीयां तन के उपर खाल की तरह लिपटी है। उधेड़कर मुक्त होना संभव कहाँ। परिणय सूत्र को तोड़ कर मातृत्व बच्चे से छीन कर अलख जगाना आसान कहाँ।
सृष्टि के विशाल होने से उसे क्या फ़र्क पड़ता है। उसकी तो सृष्टि घर की चारदीवारी के भीतर पनपती है। मनचाहा आकार ले लेती है उसकी इच्छाएं अपनों के सपनो में ढलती। पूरा विश्व अपने परिवार की आँखों की धुरी तक सिमित उसका। जीवन की हलचल परिवार की हंसी, जीवन का कोलाहल परिवार का पोषण है।
कभी-कभी पतीले में चाय की तरह उबलती है थकान पसीजती तन में तब चेतना की झनझनाहट उसे भी उकसाती है। असीम दु:ख का केंद्र बिन्दु तलाशने की तमन्नाएँ सर उठाती है तब वो भी आत्मा की खोज में सब छोड़-छाड़ कर, घर-बार त्याग कर मोह का अंचला उतारकर दहलीज़ लाँघना चाहती है। उसके भी वक्ष के भीतर धमासान मचा है। उसे भी पाना है खुद को, जानना है जन्म और मृत्यु के रहस्यों को। पर वामा के उर में अरमानों की कोई दीपशिखा नहीं जलती। एक घर की खूंटी के उपर टंगा है उसका अस्तित्व।
ज़िंदगी का मर्म जानने से ज़्यादा उसके लिए अपने आस-पास रची बसी अवलम्बित दुनिया को पीठ पर लादना ज़्यादा जरूरी है। उसका जन्म चट्टान की परिभाषा है। उसकी काया के भीतर ममता का विस्तृत आसमान रचा है। वो करुणा का उपहार कैसे कोई निश्चय करें अपने तनय को त्यागने का।
कितनी कुमारीकाएं जन्मती है और जन्म के साथ ही विसर्जन कर देती है अपनी मनोवृत्ति की मालाएं, कितनी यौवनाएं दरिंदों के हवस की रोटी बनती है। कितनी वृद्धाएं अभिशाप से मरती है। फिर भी
जीवन को धन्य मानती, स्त्री के सांचे में ढ़लती ज़िंदगी की पटरी पर दौड़ती रहती है। हर स्टेशन से दिल के डिब्बे में मुसाफ़िर भरती। मोहाँध है उसका बोझ
कैसे बनें वो बुद्ध ? उसने नारी के नाम का चोला चढ़ाया है। आधी रात को परिवार को सोता हुआ छोड़ कर निकल जाना क्या लाज़मी है ? या आसान है उसके लिए। यशोधराएं सोच भी नहीं सकती। सुबह एक कान से दूसरे कान तक खबर पहुँचते ही करार दी जाएगी बदचलन, छिनाल और जाने क्या-क्या।
उसके तो पति भगवान राम थे। "याद तो होगी अग्नि परीक्षा"
गुनगुनी नदी से उपालंभ के सैकड़ों बिच्छु लिपटे है उसके हिस्से में कोई समुन्दर नहीं।
अगर वो बुद्ध बनना चाहेंगी तो संसार की क्षितिज पर जिम्मेदारी का सूरज डूबता हुआ नज़र आएगा।
(भावना ठाकर, बेंगलोर)भावु
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