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अगस्त क्रान्ति 9अगस्त1942 एक ऐतिहासिक पल

अगस्त क्रान्ति 9अगस्त1942 एक ऐतिहासिक पल*
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आज हम अगस्त क्रांति की 72 वीं सालगिरह मना रहे है। 9 अगस्त 1942 का दिन भारत के लिए एक ऐतिहासिक दिन है,इसी दिन भारत छोड़ो आंदोलन की सुरुआत हुई थी। इस क्रांति को अगस्त क्रान्ति के नाम से भी जाना जाता है। इस आंदोलन का प्रारंभ मुम्बई स्थित एक पार्क से हुआ,उसे अगस्त क्रांति मैदान का नाम दिया गया।
             द्वितीय विश्वयुद्ध में समर्थन लेने के बावजूद जब अंग्रेज भारत को स्वतंत्र करने को तैयार नही हुए तो महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन के रूप में आजादी की अंतिम जंग का ऐलान कर दिया,जिससे ब्रिटिश हुकूमत में दहसत फैल गयी । महात्मा गांधी को सरकार ने गिरफ्तार भी किया। अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के लिए गांधी के नेतृत्व में सबसे बड़ा असहयोग आंदोलन भी चलाया गया। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इतने बड़े आंदोलन की चिंगारी कैसे धधकी ? इसमें सबसे महत्वपूर्ण सर स्टेफोर्ड क्रिप्स की वापसी के खिलाफ महात्मा गांधी का विरोध प्रदर्सन था। जुलाई 1942 में  कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने इस आंदोलन को स्वीकार किया और अगस्त 1942 में प्रस्ताव पास हुआ। सरदार पटेल, डॉ राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण जैसे वरिष्ठ गांधीवादियों ने खुलकर आंदोलन का समर्थन किया। हालांकि आन्दोल के लिए कांग्रेस के सभी दलों को एक झंडे के नीचे लाने में सफलता नही मिली। मुस्लिम लीग , भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और हिन्दू महासभा ने इस आह्वान का विरोध किया।        8 अगस्त  1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के मुम्बई सत्र में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया गया।  स्वतंत्रता संग्राम के हमारे महान नेताओ अब्दुल कलाम आजाद, सरदार पटेल, महात्मा गांधी और नेहरू को 9 अगस्त को गिरफ्तार कर लिया गया। इसी समय आजादी के लिए मचल उठे देशवासियों को गांधी जी ने  
"करो या मरो" का अमर नारा भी दिया। लार्ड लिनलिथगो ने अहिंसा को हटाने के लिए हिंसा की नीति अपना ली।  भारत छोड़ो आन्दोलन के आधे चरण में ही कई हड़तालों ,प्रदर्शन और जुलूस ने अंग्रेजों के हाथ पांव फुला दिए। आंदोलन के दूसरे चरण में सरकारी बिल्डिंगों , म्यूनिसपल हाउसेस, पोस्ट आफिस, और रेलवे स्टेशनों में छापे पड़े और आगजनी की गई। अंग्रेजो ने इस आन्दोलन को कुचलने के लिए मशीनगन और बम का इस्तेमाल किया लें अंग्रेज आंदोलन की धार को कुंठित नही कर पाए। इस आंदोलन का आखिरी और महत्वपूर्ण पड़ाव सितंबर 1942 में प्रारम्भ हुआ, इसके तहत सरकारी जगहों जैसे बॉम्बे और मध्यप्रदेश में हमले किये गए। अंत मे आंदोलन को महत्ता मिलनी सुरु हुई,और आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से चलता रहा, जब तक कि महात्मा गांधी की रिहाई नही हो सकी। ब्रिटिश हुकूमत के पास वॉयसराय की मुस्लिम परिषद और कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन था। यही नही उनके पास अमेरिका का भी समर्थन था, जो आंदोलन को बुरी तरह कुचल देना चाहते थे। आखिर में अंग्रेजों को हार का सामना करना पड़ा और भारतीयों के हाथों मिली ऐसी हार को वो पचा नही पाए। ऐसे में अंग्रेजों ने भारत को तत्काल आजादी देने से इंकार कर दिया लेकिन कुछ वर्षों के इंतज़ार के बाद द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति पर 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली।

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