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ग़ज़ल,सत्ता का फरमान हमारे सिर माथे

*ग़ज़ल*
सत्ता का फरमान हमारे सिर माथे ।
मरें मज़ूर किसान हमारे सिर माथे ।
योगासन की महिमा है अनुपम न्यारी,
उत्तम है गुणगान हमारे सिर माथे ।
भूख-प्यास आडे़ आवत है बाबाजी ,
लुटे सभी अरमान हमारे सिर माथे ।
हत्या लूट खसोट फ्राड पाकेट मारी,
नींद हुई हलकान हमारे सिर माथे ।
खेती-बाड़ी बीज खाद फिर महंगाई,
भारी लगे लगान हमारे सिर माथे ।
बिगड़ी भाईबंदी या अपना -तेरी,
दबंगई मेहमान हमारे सिर माथे ।
राजनीति की वही पुरानी चौपड़ है,
रहती तनी कमान हमारे सिर माथे ।
डींगें जुमले हवा हवाई लफ़्फाजी ,
खूब चढी़ परवान हमारे सिर माथे ।
खाली हुए ख़ज़ाने क़र्ज़ लदा भारी,
देश हुआ शमशान हमारे सिर माथे ।
शोषण ऊंच नीच रिश्वत दादागीरी,
नहीं थमी जजमान हमारे सिर माथे ।
हिंदी अभी थेगडी़ जैसी ही लगती,
अंग्रेजी हैवान   हमारे सिर माथे ।
नीयत साफ मिलन जी खुश रहते,
होता है कल्याण हमारे सिर  माथे। 
 *डा.राजेन्द्र मिलन*
      आगरा

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