नकारा नहीं जा सकता डॉ मुखर्जी का योगदान
समाचार सम्पादक अमित चतुर्वेदी
औरैया। मंगलवार को डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी को उनके बलिदान दिवस पर याद किया गया। लोगों ने देश के लिए बलिदान होने वाले मुखर्जी जी को नमन किया।इस अवसर पर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन दर्शन पर शोध करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला प्रचारक पीयूष कुमार ने कहा कि हम सब देशवासी उनके इस बलिदान को कभी नहीं भूल पाएंगे।
उन्होंने कहा कि भारतीय जनसंघ के संस्थापक रहे डॉक्टर मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय में उपकुलपति के पद पर नियुक्ति पाने वाले सबसे कम आयु के उपकुलपति थे।उन्होंने स्वेच्छा से अलख जगाने के उद्देश्य से राजनीति में प्रवेश किया,पर विडंबना यह रही कि तत्कालीन (सरकार)सत्ता के खिलाफ जाकर सच बोलने की जुर्रत करने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। और उससे भी बड़ी विडंबना की बात यह है कि आज भी देश की जनता उनकी रहस्यमयी मौत के पीछे का सच जानने में नाकामयाब रही। उन्होने जो भी किया देश के लिए किया।उन्होने धारा 370 का काफी विरोध किया और मातृभूमि के लिए अपने जीवन का बलिदान तक दे दिया। डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अपनी अंतिम सांसे जम्मू कश्मीर में लीं। जिस धारा 370 का विरोध उन्होंने उस समय किया और अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए आज गर्व की बात है कि उनके इस अधूरे सपने को जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाकर साकार किया जा चुका है। उन्होंने 1952 में कानपुर में भारतीय जनसंघ के अधिवेशन का जिक्र करते हुए कहा कि इस अधिवेशन में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की वैचारिक कार्य क्षमता एवं संगठन कौशल को देखकर कहा था कि यदि उन्हें दो दीन दयाल मिल जाएं तो वे भारतीय राजनीति का नक्शा बदल दें। डॉक्टर मुखर्जी कि ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने कहा था कि एक देश में दो विधान ,दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेगा।
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