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मधुशालाओं की स्वतंत्रता सरकारों का महादुःखद क़दम कोढ़ में खाज साबित होगा:घनश्याम सिंह*

*मधुशालाओं की स्वतंत्रता सरकारों का महादुःखद  क़दम कोढ़ में खाज साबित होगा:घनश्याम सिंह*
👍■ *महज राजस्व बढ़ाने के लिए हम देश वासियों को "कोरोना" के बिकराल दलदल में नहीं झोंक सकते*
👍■ *देशहित में देश में पूर्णतयः नशा बन्दी लागू करने के स्थान पर देश में शराब का कारोबार शुरू करना दुःखद*
👍■ *परमश्रद्धेय प्रधानमंत्री, सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को शराब बिक्री का आदेश तत्काल वापस लेना चाहिए,और जनहित में सभी प्रकार के नशा उत्पादों पर प्रभावी रोक लगानी चाहिए*
foto Upnews21
  "देशवासियों को कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी से बचाने के लिए लागू किए गए लॉक डाउन के तहत की गई शराब बंदी को शुरू करना यह हमारी सरकार की सोच का बिना सोचा समझा क़दम माना जाए तो अतिश्योक्ती नहीं होगी,पहला सवाल यह है कि आपने इसे "शराबबंदी" को लागू इसीलिए किया था कि यह उचित था,अब इसे महज राजस्व वृद्धि के लिए चालू किया जाना क्या एंटीबायोटिक के रूप में देखा जा रहा है,आप एक तरफ जहां देश वासियों को "कोरोना" जैसी वैश्विक महामारी से बचाने के लिए लॉक डाउन लागू कर बहुत बड़ा बलिदान कर अपने सभी सरकारी व गैर सरकारी उपक्रम ठप्प किये हैं,घर-घर घंटा बजवाकर जनता को जागरूक कर रहे हैं,जनता को भोजन,उपचार,यातायात की सुविधा उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं,अधिकारी,चिकित्स्क, फोर्स के जवान,समाजसेवी,पत्रकार साथी अपनी जान हथेली पर रखकर कोविड-19 से जंग लड़ रहे हैं, वहीं आप किस दृष्टि से दूसरी तरफ शराब बंदी ख़त्म कर इसकी बिक्री शुरू कर रहे हैं,मेरा मानना है यदि शराब पीने वाले लोगों को इससे एक भी लाभ होता तो आप इसकी बोतलों में "शराब पीना विष से भी भयंकर है" यह नहीं लिखते,न ही इसके सार्वजनिक उत्पादन को अवैधानिक घोषित करते,
आपने देखा कि शराब बिक्री चालू होने पर मधुशालाओं पर मदिरा प्रेमियों की कैसी महाभीड़ उमड़ी,सोशल डिस्टेंस की कैसी धज्जियां उड़ाई गईं,ऐसी राजस्व वृद्धि किस काम की रही,क्या जनता की "जान" से ज्यादा कीमती है शराब से आने वाला राजस्व,क्या राजस्व वृद्धि के अन्य श्रोत खत्म हो गए हैं,
  मैं तो जानकारों से यह पूंछना चाहता हूँ कि आप किसी को एक बार यह बात बता सकते हैं कि शराब या किसी प्रकार के नशा से क्या लाभ है,यदि आपको किसी भी दृष्टि से नशा लाभदायक लगता है तो आप अपने परिजनों को नशा करने की इजाज़त देंगे,क्या हमारे देश के पूर्वजों,समाजसेवियों,अवतारों के योगदान बेकार चले गए, क्या नशा के बारे में किसी धर्म की पवित्र पुस्तक में कोई उल्लेख मिलता है जिससे आप अपने समाज-समुदायों को नशा पान की इजाज़त दें, "आपको स्मरण दिलाना चाहता हूँ कि किसी भी ईश्वरावतार चाहे वह ईसामसीह, हज़रत मुहम्मद,हज़रत मूसा,आदर्श पुरुषोत्तम श्री राम,श्री कृष्ण,बहाई धर्म संस्थापक बहाउल्लाह"ईश्वर का प्रकाश" हों सबने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष नशा को नाजायज़ करार देते हुए लोगों को इससे बचने की सीख दी,इसमें सबसे ताजा व स्पष्ट उदाहरण आज के करीब दो सौ वर्ष पूर्व स्थापित बहाई धर्म की पवित्र पुस्तकों में संस्थापक बहाउल्लाह ने अपने बचनों में कहा था कि "दुनियां को नशा विनाश के गर्त में ले जा रहा है,इसलिए दुनियां से प्रत्येक प्रकार का नशा खत्म होना चाहिए"उनका यह विचार आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक व अनुकरणीय है, हमारे देश के पालनहार प्रधानमंत्री, सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को शराब बिक्री का आदेश तत्काल वापस लेना चाहिए,और जनहित में सभी प्रकार के नशा उत्पादों पर प्रभावी रोक लगानी चाहिए,
  चलते-चलते आज इस संकट की घड़ी में "शराब बिक्री की पाबंदी हटाये जाने की बात पर "समुद्र मंथन की बात हमें याद आ गयी है, जिसमें देवताओं-दैत्यों में 
समुद्र मंथन हुआ था,उसमें चौदह रत्न निकले थे,आपने भी पढ़ा होगा, इसी में सुरा भी निकली थी,जिसे असुरों को परोसा गया था, अजीब संयोग है कि आज हमारा देश वैश्विक महामारी की जंग का समुद्र मंथन कर रहा है,जिसमें निकला चौदहवां रत्न "सुरा" परोसी जा रही है,
इस संबंध में पूर्व में 18.02.1987 को लिखी व प्रथम बार परमपूज्य वरिष्ठ पत्रकार गुरु जी श्रद्धेय ओमप्रकाश राठौर द्वारा प्रकाशित "तिर्वा टाइम्स" में प्रकाशित कविता याद आ रही है-
"जो नाश कर डाले स्वयं को ऐसा नशा क्या ?
हाथ क्यों डाले गले में,रह गया अब शेष क्या ?
ऐसी मौज को छोड़ो जो हमको मेटती है !
मजे में मौत को भूले न हमको सूझती है!!
ऐ दुनियां छोड़ मदिरा को,ये मदिरा कह रही है।
मैं त्याजाज्य कुपेय कसम जो गंगा बह रही है।।
अगर न हो विश्वास वेद के पन्ने तुम    खोलो।
देखो मिले प्रमाण हुआ था सागर मंथन बोलो।।
मदिराचल की बनी मथानी शेषनाग जी लपटे थे।
निकले चौदह रत्न उसी से अजीब-अटपटे थे।।
इन्हीं चौदहों रत्नों में ये मदिरा भी शामिल थी।
था अमृत योग्य सुरों के,मदिरा असुरों के काबिल थी।
इसलिये भूल से शायद मदिरा ले बैठे तुम।
तो अभी विसर्जन करके अम्रत का पान करो नारायण दर्शन करके।।
--घनश्याम सिंह वरिष्ठ पत्रकार व त्रिभाषी रचनाकार
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