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गाँवों में आज भी जिन्दा हैं प्राचीन परम्परायें।

गाँवों में आज भी जिन्दा हैं प्राचीन परम्परायें।

सहार। फागुन का महीना लगते ही मौसम और जनमानस में  एक खुमार सा परवान चढ़ने लगता है फागुन के महीने में एक अजीब सी फगुनिया मस्ती लोगों
पर सवार हो जाती है।ग्रामीण क्षेत्रों में पुरानी परम्परायें आज भी जिन्दा हैं गाँवो में आज भी लोग होली का

त्यौहार बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं होली के त्यौहार पर लोग आपसी गिले शिकवे भूलकर मिलजुल कर त्यौहार मनाते हैं। ग्राम पुर्वा भीखा में प्राचीन शिव मन्दिर पर सैकड़ो वर्षों से होली जलने के दूसरे दिन मन्दिर पर पूरे गाँव के लोग एकत्रित होते हैं और फिर सभी लोग मिलकर फाग गायन करते हैं और आपस में
एक दूसरे के रंग और अबीर लगाकर होली मनाते हैं ।इसके बाद सभी लोग आपस में मिलकर होली में आखत डालते हैं और होली की राख से होली खेलते हैं इसके बाद एक दूसरे के घरों में जाकर होली की बधाई देते हैं।
उधर कस्बा सहार में प्राचीन शिव मंदिर चंदनेश्वर महादेव शिवधाम मंदिर में कस्बा के सभी ग्रामीण एकत्रित होकर फाग गायन का आयोजन करते है फाग गायन में प्रमुख रूप से ब्रज मोहन, शज्जो पांडेय,शिवदत्त,मूलचंद्र,उमेश पांडेय,अश्वनी पांडेय,ढोलक वादक रामू पांडेय सहित अन्य लोगों का विशेष योगदान रहता है।ये कस्बा कि सैकड़ों वर्ष पुरानी परम्परा है इसके बाद सभी लोग पूरे कस्बे में घर - घर जाकर  एक दूसरे के रंग अबीर लगाकर होली खेल शुभकामनाएं देते है और एक दूसरे के गले मिलकर गिले शिकवे मिटाते है।वहां आज भी पुरानी परंपराएं जीवित है और देखने को मिलती है।इस अवसर पर चन्द्र किशोर पांडेय, बच्चू पांडेय,विवेक पांडेय,गुड्डे पांडेय,श्री नारायण,नीलू पांडेय,मनीष शर्मा,धीरज पांडेय,अनूप पांडेय,रोहित गुप्ता,मुकेश शुक्ला,पुर्वा भीखा निवासी सतेंद्र सिंह सेंगर,अखिलेश सिंह सेंगर,परमलाल, लज्जाराम, अशोक कुमार,रामविलास, देवेन्द्र,हरी सिंह, सुजीत कुमार,नितीश सिंह,रामौतार, महेशचंद्र, ऊदल,मनोज कुमार आदि ग्रामीणों ने बताया कि हमारे गाँव में सभी लोग मिलजुलकर होली का त्यौहार मनाते हैं और मिल कर खूब हुड़दंग और मस्ती करते हैं।

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